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Showing posts from May, 2018

kamyabi

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कामयाबी  कामयाब तो सभी  होना  चाहते  है  पर कामयाबी  को यहाँ  कोन  जानता   है  इंसान  रूपए - पैसे  और शोहरत  को ही कामयाबी  मानता  है  पैसा  बिस्तर  देता  है,नींद नहीं  पैसा  खाना  देता  है,सेहत  नहीं  पैसा  घडी  देता  है ,वक़्त नहीं  पैसा  साथी  दे  सकता  है ,प्यार  नहीं  क्या  कामयाबी का मतलब   सच्ची ख़ुशी नहीं  है ? क्या  कामयाबी  हस्ते  खेलते  परिवार  में  नहीं  है ? क्या  कामयाबी  का मतलब एक  सच्चा  प्यार नहीं  है? अगर  मेरे  सवालों  में  कामयाबी  है  तो  क्या हमारी  कामयाबी  की  परिभाषा  उलटी  नहीं है? जिस परिवार  के सदस्यों  के पास ,एक दूसरे के लिए समय ही नहीं  जहाँ  पति  पत्नी  को खुद की ज़िन्दगी से फुर्सत ही नहीं  वहाँ  कोनसी  कामयाबी  मिलेगी  ? जवानी   में  माँ  बाप  ,अपने  बच्चो  को  वक़्त  नहीं  देते  वही  बच्चे  अपनी  जवानी  में ,बूढ़े बी माँ  बाप  को  महत्व  नहीं  देते  ये   कोनसी  कामयाबी   है ? पैसा  कमाना   गलत  नहीं  पर  इस  पैसे  और समाज की झूठी  शान  के लिए  सब  कुछ भूल जाना , सही  नहीं  अपनी  जरूरतों  को   एक  हद से  ज्यादा  बढ़ाना  सही  न

Mujhe kuch krke dikhana hai

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मुझे  कुछ  कर  के  दिखाना  है  कुछ करने की है  इच्छा  ना  जाने  क्या बुरा  क्या  है  अच्छा  कुछ करना है  ये ठाना  है  कुछ बनके  मुझे   दिखाना  है  रास्ता  थोड़ा  कठिन  है  ये  माना  पर  मुझे  इसके  पार  है  जाना  बहुत  ठोकरे  खाई  है ज़िन्दगी में  तब यहाँ  तक  हुँ  आई  ज़िन्दगी में  अब  खुद  को नई  बुलंदी  तक  पहुँचाना  है  मुझे  कुछ करके  दिखाना  है  बेटी  हो  कर  बेटे   का  फ़र्ज़  निभाना  है  मुझे  कुछ करके   दिखाना   है  चाहे  मेरी  मंज़िल  दूर  है  पहुँचना  तो एक  दिन  जरूर  है  मुश्किलो  से  नहीं  अब  घबराना  है  मुझे  कुछ करके    दिखाना  है  क़र्ज़  अपने  शिक्षकों  का  चुकाना  है  मुझे कुछ करके  दिखाना  है  गलत  मत  समझना   इस  क़र्ज़  को  मेरी  बातो  की इस तर्ज़  को  ये  क़र्ज़  रूपए  पैसे  का नहीं  बल्कि  उस तालीम  का है   जो  दी  मुझे  उन  शिक्षकों  ने  ये  शिक्षक  मिले  मुझे  कई  रूपों  में  कई  रिश्तो  के स्वरूपों  में  कभी  बहन  तो कभी  भाई   कभी भुआ  तो  कभी  ताई    किताबे  पढ़ना  सिखाया  स्कूलों  ने  ज़िन्दगी   पढ़ना  सिखा

ghar

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                                   घर  ईंटो   और  दीवारों  से   मकान  बनते हैं प्यार  और  दुलार  से  घर  बनते  हैं  मज़दूर  तो  मकान  बनाते  है  घर  को  परिवार  बनाते  है  जिन   परिवारो  में  प्यार  और इत्तेफ़ाक़ होता  है  वो  घर ही तो  स्वर्ग  कहलाते  हैं  वही  घर  उन  घरवालों  के आशियाने  कहलाते  है  जहाँ  परिवारों  में  ईर्ष्या  और  द्वेष  हो  जहाँ  लोग एक दूसरे  की ही  जड़ो  को कुतरते  हैं  वो  घर  नहीं  लड़ाई के मैदान  बन  जाते  हैं  जिन  घरों  में  माता पिता  ईश्वर  माने  जाते  हो  वो घर  ही मंदिर  बन  जाते  हैं  ये  तन भी  एक  मकान  ही तो है    आत्मा  जिसमें  रहती है  परन्तु  घर  तो उसका  वो  परमात्मा  है  जिसमें जा कर वह लीन   होती   है  

yaad

वो कहते  हैं                 हम उन्हें याद  नहीं करते हमने कहा                याद उसे  किया  जाता  है जिसे  हम  भूल  जाए पर दोस्तों  को  यूँ  भुलाया  नहीं  करते माना  ज़िन्दगी  ने उलझाया  कुछ  इस  कदर कि  बात  अपनी  हो  ना   सकी पर ये  कैसे  सोच लिया   आपने कि  आपकी  याद  हमारे   दिल  से  न  गुज़री हुज़ूर  दोस्ती की  है  आपने तो  निभाइए  आप  भी कभी  याद  हम  करें और कभी  याद कीजिये   आप  भी सलाम  हमारा  जो  ना  आए तो  सलाम  भिजवाइए  आप  भी अगर  बात मेरी  करते हो  तो मेरी याद में  तो  वो  रिश्ते  भी ताज़ा  हैं जिन्हे  सिर्फ एक  मुसकान  ने  साजा  है फिर  तुम्हे  कैसे  भूल सकती हूँ जिससे  दिल  के कुछ  राज़  भी  मैने  खोले  हैं कुछ  ठाहके  भी  मैने  बांटे  हैं कुछ  आँसू  भी  कभी  छलकाए  होंगे फिर भी  तुम्हारी नज़र में  नाजाने  क्यों हम  पराए  हैं ऐ  दोस्त मेरी  दोस्ती ,तोहफों  से  नहीं  बिकती बल्कि  दोस्त की मुस्कुराहटों  से  बिकती  है उम्मीद  है शिकायत  तुम्हारी  दूर हुई होगी दोस्ती  हमारी  तुम्हे  कुबूल हुई होगी

yaha sab pagal hai

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यहाँ  सब  पागल  हैं कोई  दौलत  के लिए  पागल कोई  शौहरत  के लिए पागल बच्चे  अंको के  लिए  पागल बड़े  शंको  के लिए  पागल नौजवान  जवानी  से  पागल बूढ़ा  बीमारी  से पागल मोटा वज़न  घटाने  के लिए   पागल पतला  डोले  बनाने   के लिए  पागल दूकानदार मुनाफा बढ़ाने में पागल आम आदमी  खर्च घटाने  में  पागल कर्मचारी  दफ्तर  में  काम   से पागल बेरोज़गार  खाली  जेब  से पागल अकेला अकेलेपन से  पगलाए दुनिया से कदम मिलाता  भी करता  हाय  हाय हर कोई सुनाता   उसे अपनी  राय और  वो  सोचे  कि अब  कहाँ  जाए दुनिया जिसे पसंद करे , उसकी  कमियाँ   ना  देख  पाए नफरत   जो अगर  हो तो   , उसके गुण   भी  इसे  नहीं भाए इस  पागलपन  का हल  यों  निकाला  जाए ज़िन्दगी को तोहफा  मान  हर पल  जिया   जाए इसे  किसी  रेस  की तरह  हारा और  जीता  न जाए हर  चीज़ को एक हद  तक  किया  जाए

school ke din

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स्कूल के  दिन सुबह माँ  की आवाज़  का  वो अलार्म वो पाँच मिनट  औऱ  वाला  आराम वो बाथरूम के बाहर  से माँ  का  चिल्लाना "जल्दी  निकल "स्कूल  है जाना फिर  कभी गरम कभी ठंडा  दूध गटकाना वो भारी  भारी  बैग  उठाना सब का  था  कोई  न  कोई  दिवाना वो था बड़ा  शरीफ़  जमाना वो  छुप  छुप  कर  देखना  और  कभी  नज़र  चुराना वो दोस्तों  का   उलटे सीधे   नामों  से  सताना कभी  ये तेरी वाली  ,वो मेरी वाली  बातों  से गुदगुदाना वो सबसे  पहले स्कूल  पहुंचकर  होमवर्क  देखना  और  दिखाना वो पहले  बैंच  पर  बैठने  के  लिए   दोस्त से  टकराना वो रिसेस   में  दोस्तों  के  साथ  बैठकर  खाया  खाना वो स्कूल  की शरारते और  टीचर्स  का  मुर्गा  बनाना वो  दोस्तों  का  सताना  ,फिर  घंटो  मनाना वो  कटी अब्बा  वाला  ज़माना वो  स्कूल की  गर्मी  की छुटियो का  मज़ा  सुहाना काश ,लौट  आए  वो  समय  पुराना  नोट : इस  कविता  में  अंग्रेजी  के  कुछ  शब्द  जान  बुझ  लिए  हैं ,ताकि  पढ़ने  वाले  कविता  का  सरल  भाषा  में  पूरा  मज़ा  ले  सके